Wednesday, 13 July 2016

मंगलवार को ये उपाय करने से हनुमान जी हर मनोकामना पूरी करेंगे

जिस पर हनुमान जी की कृपा होती है उसके सारे कार्य पूर्ण हो जाते हैं। एकादश रुद्रावतार हनुमान जी मंगल के अधिष्टाता हैं। राम भक्त हनुमान जी की पूजा-उपासना के लिए मंगलवार अौर शनिवार का दिन विशेष महत्व रखता है। जब हनुमान जी का जन्म हुआ तो उस दिन मंगलवार था। माना जाता है कि मंगलवार को विशेष प्रयोग करने से चुटकियों में बिगड़े काम बनने लगते हैं, हर समस्या का समाधान होने लगता है और मनोकामनाएं भी पूरी होती हैं। आइए जानें: - मंगलवार को सुबह जल्दी उठकर स्नान कर 7 बार हनुमान चालीसा पढ़ें। - शनि के दोषों से छुटकारा पाने के लिए शनिवार वाले दिन हनुमान जी को चोला अर्पित करें। कुमकुम अौर चमेली का तेल अर्पित करके हनुमान चालीसा या उनके अन्य मंत्रों का जाप करें अौर तिल के तेल का दीपक जलाएं। इसके पश्चात काले चने, गुड़ अौर नारियल अर्पित करने के बाद शनि दोषों से बचने हेतु अंजनी पुत्र हनुमान को 108 नामों का ध्यान करने से लाभ अवश्य मिलता है। - हर मंगलवार हनुमान जी काे संतरी सिंदूर में चमेली का तेल मिलाकर उन्हें चोला चढ़ाएं। - मंगल ग्रह के कारण स्वास्थ्य संबंधित समस्या आ रही हो तो मंलवार के दिन हनुमान जी को चोला अौर साथ में चमेली का तेल, कुमकुम, चने अौर सूरजमुखी के फूल अर्पित करें। इसके पश्चात पीपल के नौ पत्ते लेकर उन पर चंदन की लकड़ी से श्री राम नाम लिखकर हनुमान जी को अर्पित करके उनकी 108 परिक्रमा करके विनती करें। बिगड़े कार्य बनने शुरु हो जाएंगे। - हनुमान जी दांए पैर से टीका लेकर अपने माथे पर लगाएं। - डर अौर तनाव से मुक्ति पाने के लिए राम भक्त हनुमान जी का 7 दिन विशेष पूजन करें। प्रतिदिन हनुमान चालीसा अौर हनुमान अष्टक का 100 बार उच्चारण करें। - सुंदरकांड का पाठ करें। - दक्षिण की अोर मुख करके 7 दिन प्रतिदिन पीपल के नीचे बैठकर 108 बार हनुमान चालीसा पढ़ने से आर्थिक लाभ होगा। - ग्रहों की समस्या से छुटकारा पाने के लिए प्रत्येक मंगलवार अौर शनिवार हनुमान मंदिर में काले चने अौर गुड़ का प्रसाद बांटे अौर हनुमान चालीसा का पाठ करें। - राम नाम का जाप करें

Tuesday, 5 July 2016

काई परेशानी हो, सुंदरकांड के पाठ से दूर हो जाती है। यह एक श्रेष्ठ और सबसे सरल उपाय है। इसी वजह से काफी लोग सुंदरकांड का पाठ नियमित रूप से करते हैं।

माना जाता है कि सुंदरकाण्ड के पाठ से बजरंग बली की कृपा बहुत ही जल्द प्राप्त हो जाती है। जो लोग नियमित रूप से इसका पाठ करते हैं, उनके सभी दुख दूर हो जाते हैं। इस काण्ड में हनुमानजी ने अपनी बुद्धि और बल से सीता की खोज की है। इसी वजह से सुंदरकाण्ड को हनुमानजी की सफलता के लिए याद किया जाता है। हनुमानजी की सफलता के लिए सुंदरकाण्ड को याद किया जाता है। श्रीरामचरित मानस के इस पांचवें अध्याय का नाम सुंदरकाण्ड ही क्यों है । श्रीरामचरित मानस में कुल 7 काण्ड (अध्याय) हैं। सुंदरकाण्ड के अतिरिक्त सभी अध्यायों के नाम स्थान या स्थितियों के आधार पर रखे गए हैं। बाललीला का बालकाण्ड, अयोध्या की घटनाओं का अयोध्या काण्ड, जंगल के जीवन का अरण्य काण्ड, किष्किंधा राज्य के कारण किष्किंधा काण्ड, लंका के युद्ध की चर्चा का लंका काण्ड और जीवन से जुड़े प्रश्नों के उत्तर उत्तरकाण्ड में दिए गए हैं। रोचक जानकारी, के अनुसार हनुमानजी सी ताजी की खोज में लंका गए थे और लंका त्रिकुटाचल पर्वत पर बसी हुई थी। त्रिकुटाचल पर्वत यानी यहांं 3 पर्वत थे। पहला सुबैल पर्वत, जहां के मैदान में युद्ध हुआ था। दूसरा नील पर्वत, जहां राक्षसों के महल बसे हुए थे और तीसरे पर्वत का नाम है सुंदर पर्वत, जहां अशोक वाटिका निर्मित थी। इसी अशोक वाटिका में हनुमानजी और सीताजी की भेंट हुई थी। इस काण्ड की यही सबसे प्रमुख घटना थी , इसलिए इसका नाम सुंदरकाण्ड रखा गया है। वास्तव में श्रीरामचरितमानस के सुंदरकांड की कथा सबसे अलग है। संपूर्ण श्रीरामचरितमानस भगवान श्रीराम के गुणों और उनके पुरुषार्थ को दर्शाती है। सुंदरकांड एकमात्र ऐसा अध्याय है जो श्रीराम के भक्त हनुमान की विजय का कांड है। मनोवैज्ञानिक नजरिए से देखा जाए तो यह आत्मविश्वास और इच्छाशक्ति बढ़ाने वाला कांड है। सुंदरकांड के पाठ से व्यक्ति को मानसिक शक्ति प्राप्त होती है। किसी भी कार्य को पूर्ण करने के लिए आत्मविश्वास मिलता है। हनुमानजी जो कि वानर थे, वे समुद्र को लांघकर लंका पहुंच गए और वहां सीता की खोज की। लंका को जलाया और सीता का संदेश लेकर श्रीराम के पास लौट आए। यह एक भक्त की जीत का कांड है, जो अपनी इच्छाशक्ति के बल पर इतना बड़ा चमत्कार कर सकता है। सुंदरकांड में जीवन की सफलता के महत्वपूर्ण सूत्र भी दिए गए हैं। इसलिए पूरी रामायण में सुंदरकांड को सबसे श्रेष्ठ माना जाता है, क्योंकि यह व्यक्ति में आत्मविश्वास बढ़ाता है। इसी वजह से सुंदरकांड का पाठ विशेष रूप से किया जाता है। हनुमानजी की पूजा सभी मनोकामनाओं को पूर्ण करने वाली मानी गई है। बजरंग बली बहुत जल्दी प्रसन्न होने वाले देवता हैं। शास्त्रों में इनकी कृपा पाने के कई उपाय बताए गए हैं, इन्हीं उपायों में से एक उपाय सुंदरकांड का पाठ करना है। सुंदरकांड के पाठ से हनुमानजी के साथ ही श्रीराम की भी विशेष कृपा प्राप्त होती है। किसी भी प्रकार की परेशानी हो, सुंदरकांड के पाठ से दूर हो जाती है। यह एक श्रेष्ठ और सबसे सरल उपाय है। इसी वजह से काफी लोग सुंदरकांड का पाठ नियमित रूप करते हैं।

Saturday, 2 July 2016

मेरे प्रभु मेहन्दीपूर वाले बालाजी से मेरी प्राथना

मेरी विनती सुनो सालासर बालाजी आगया हूं तुम्हारे मैं दर बालाजी अपने चरणों मैं मुझको जगह दो प्रभु छोड़कर दर जाऊँ में अब किधर बालाजी मेरी विनती सुनो सालासर बालाजी फूल फल कूछ नही मेरे हाथो मैं है अपने आँसू की बुंदे चढ़ता हूं मैं इन श्रध्दा की बूँदों मैं है कथा बीन बोले उसे अब सुनता हूं मैं एक भय है दुखों का मैं जिससे घिरा मन से मेरे मिटा दो वो डर बालाजी मेरी विनती सुनो सालासर बालाजी ठोकरो ने मुझे दुख इतना दिया कोई दर आसरे का दिखाई ना देमनमे भक्ति ना थी तन में शक्ति ना थी गीत जीवन का कोई सुनाई ना दे अब शरण आगया हूं ना जाऊँगा मैं चरणों मैं है अब तुम्हारे घर बालाजी मेरी विनती सुनो सालासर बालाजी आगया हूं तुम्हारे मैं दर बालाजी जय श्री राम

Friday, 1 July 2016

मेरे प्रभु हनुमान से प्राथना


हे दुःख भन्जन, मारुती नंदन, सुन लो मेरी पुकार |पवनसुत विनती बारम्बार ||अष्ट सिद्धि नव निद्दी के दाता, दुखिओं के तुम भाग्यविदाता |सियाराम के काज सवारे, मेरा करो उधार ||अपरम्पार है शक्ति तुम्हारी, तुम पर रीझे अवधबिहारी |भक्ति भाव से ध्याऊं तुम्हे, कर दुखों से पार ||जपूं निरंतर नाम तिहरा, अब नहीं छोडूं तेरा द्वारा |राम भक्त मोहे शरण मे लीजे भाव सागर से तार ||

Wednesday, 29 June 2016

हनुमान चालीसा का पाठ क्यों करते है

मंदिर, दरगाह, बाबा, गुरु, देवी-देवता आदि सभी जगहों पर भटकने के बाद भी कोई शांति और सुख नहीं मिलता और संकटों का जरा भी समाधान नहीं होता है। साथ ही मृत्युतुल्य कष्ट हो रहा हो तो सिर्फ हनुमान की भक्ति ही बचा सकती है। ऐसे व्यक्ति को हनुमनजी की शरण में आना ही पड़ता है, लेकिन जो पहले से ही उनकी शरण में हैं उन्हें किसी भी प्रकार का कष्ट नहीं होता। हनुमानजी सर्वशक्तिमान और एकमात्र ऐसे देवता हैं जिनका नाम जपने से ही संकट शरीर और मन से दूर हटने शुरू हो जाते हैं। शास्त्रों अनुसार कलयुग में हनुमानजी की भक्ति को सबसे जरूरी, प्रथम और उत्तम बताया गया है लेकिन अधिकतर जनता भटकी हुई है। वह ज्योतिष और तथाकथित बाबाओं, गुरुओं को ही अपना सबकुछ मानकर बैठी है। ऐसे भटके हुए लोगों को राम ही बचाने वाले हैं। हनुमान चालीसा का पाठ क्यों करते हैं? हनुमानजी की भक्ति सबसे सरल और जल्द ही फल प्रदान करने वाली मानी गई है। यह भक्ति जहां हमें भूत-प्रेत जैसी न दिखने वाली आपदाओं से बचाती है, वहीं यह ग्रह-नक्षत्रों के बुरे प्रभाव से भी बचाती है। जो व्यक्ति‍ प्रतिदिन हनुमान चालीसा पढ़ता है उसके साथ कभी भी घटना-दुर्घटना नहीं होती। श्रीराम के अनन्य भक्त श्रीहनुमान अपने भक्तों और धर्म के मार्ग पर चलने वाले लोगों की हर कदम पर मदद करते हैं, शर्त यह है कि 'और देवता चित्त न धरहीं।' हनुमानजी को मनाने के लिए सबसे सरल उपाय है हनुमान चालीसा का नित्य पाठ। हनुमानजी की यह स्तुति सबसे सरल और सुरीली है। तुलसीदास द्वारा रचित हनुमान चालीसा बहुत प्रभावकारी है। इसकी सभी चौपाइयां मंत्र ही हैं। जिनके निरंतर जप से ये सिद्ध हो जाती है और पवनपुत्र हनुमानजी की कृपा प्राप्त हो जाती है। यदि आप मानसिक अशांति झेल रहे हैं, कार्य की अधिकता से मन अस्थिर बना हुआ है, घर-परिवार की कोई समस्या सता रही है तो ऐसे में इसके पाठ से चमत्कारिक फल प्राप्त होता है, इसमें कोई शंका या संदेह नहीं है।

Thursday, 23 June 2016

जय श्री राम

जय श्री राम मित्रों मैं अपने प्रभु श्री हनुमान जी के बारे मैं कूछ कहूँगा मेरे प्रभु श्री राम भक्त हनुमान की बात ही कूछ और है वे इतने दयालु है की किसी के भी संकट हर लेते है उन्हे याद करते ही उनके भक्तो का बाल भी बाँका नही हो सकता है क्योंकि जो भी उनपर त्तंत्र करता है या मंत्र जादू करता है या टोना बादमें उनको हार मानकर पड़ता है रोना जय श्री राम जय श्री हनुमान

Wednesday, 22 June 2016

जय श्री राम

॥दोहा॥ श्रीगुरु चरन सरोज रज निज मनु मुकुरु सुधारि । बरनउँ रघुबर बिमल जसु जो दायकु फल चारि ॥ बुद्धिहीन तनु जानिके सुमिरौं पवन-कुमार । बल बुधि बिद्या देहु मोहिं हरहु कलेस बिकार ॥ ॥चौपाई॥ जय हनुमान ज्ञान गुन सागर । जय कपीस तिहुँ लोक उजागर ॥१॥ राम दूत अतुलित बल धामा । अञ्जनि-पुत्र पवनसुत नामा ॥२॥ महाबीर बिक्रम बजरङ्गी । कुमति निवार सुमति के सङ्गी ॥३॥ कञ्चन बरन बिराज सुबेसा । कानन कुण्डल कुञ्चित केसा ॥४॥ हाथ बज्र औ ध्वजा बिराजै । काँधे मूँज जनेउ साजै ॥५॥ सङ्कर सुवन केसरीनन्दन । तेज प्रताप महा जग बन्दन ॥६॥ बिद्यावान गुनी अति चातुर । राम काज करिबे को आतुर ॥७॥ प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया । राम लखन सीता मन बसिया ॥८॥ सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा । बिकट रूप धरि लङ्क जरावा ॥९॥ भीम रूप धरि असुर सँहारे । रामचन्द्र के काज सँवारे ॥१०॥ लाय सञ्जीवन लखन जियाये । श्रीरघुबीर हरषि उर लाये ॥११॥ रघुपति कीह्नी बहुत बड़ाई । तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई ॥१२॥ सहस बदन तुह्मारो जस गावैं । अस कहि श्रीपति कण्ठ लगावैं ॥१३॥ सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा । नारद सारद सहित अहीसा ॥१४॥ जम कुबेर दिगपाल जहाँ ते । कबि कोबिद कहि सके कहाँ ते ॥१५॥ तुम उपकार सुग्रीवहिं कीह्ना । राम मिलाय राज पद दीह्ना ॥१६॥ तुह्मरो मन्त्र बिभीषन माना । लङ्केस्वर भए सब जग जाना ॥१७॥ जुग सहस्र जोजन पर भानु । लील्यो ताहि मधुर फल जानू ॥१८॥ प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहीं । जलधि लाँघि गये अचरज नाहीं ॥१९॥ दुर्गम काज जगत के जेते । सुगम अनुग्रह तुह्मरे तेते ॥२०॥ राम दुआरे तुम रखवारे । होत न आज्ञा बिनु पैसारे ॥२१॥ सब सुख लहै तुह्मारी सरना । तुम रच्छक काहू को डर ना ॥२२॥ आपन तेज सह्मारो आपै । तीनों लोक हाँक तें काँपै ॥२३॥ भूत पिसाच निकट नहिं आवै । महाबीर जब नाम सुनावै ॥२४॥ नासै रोग हरै सब पीरा । जपत निरन्तर हनुमत बीरा ॥२५॥ सङ्कट तें हनुमान छुड़ावै । मन क्रम बचन ध्यान जो लावै ॥२६॥ सब पर राम तपस्वी राजा । तिन के काज सकल तुम साजा ॥२७॥ और मनोरथ जो कोई लावै । सोई अमित जीवन फल पावै ॥२८॥ चारों जुग परताप तुह्मारा । है परसिद्ध जगत उजियारा ॥२९॥ साधु सन्त के तुम रखवारे । असुर निकन्दन राम दुलारे ॥३०॥ अष्टसिद्धि नौ निधि के दाता । अस बर दीन जानकी माता ॥३१॥ राम रसायन तुह्मरे पासा । सदा रहो रघुपति के दासा ॥३२॥ तुह्मरे भजन राम को पावै । जनम जनम के दुख बिसरावै ॥३३॥ अन्त काल रघुबर पुर जाई । जहाँ जन्म हरिभक्त कहाई ॥३४॥ और देवता चित्त न धरई । हनुमत सेइ सर्ब सुख करई ॥३५॥ सङ्कट कटै मिटै सब पीरा । जो सुमिरै हनुमत बलबीरा ॥३६॥ जय जय जय हनुमान गोसाईं । कृपा करहु गुरुदेव की नाईं ॥३७॥ जो सत बार पाठ कर कोई । छूटहि बन्दि महा सुख होई ॥३८॥ जो यह पढ़ै हनुमान चालीसा । होय सिद्धि साखी गौरीसा ॥३९॥ तुलसीदास सदा हरि चेरा । कीजै नाथ हृदय महँ डेरा ॥४०॥ ॥दोहा॥ पवनतनय सङ्कट हरन मङ्गल मूरति रूप । राम लखन सीता सहित हृदय बसहु सुर भूप ॥